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राजस्थान की 5 चित्रकला शैलियाँ — CET/RAS PYQ के साथ (2026 Free Notes)

Sudhir SirSudhir Sir (इतिहास विशेषज्ञ)
12 अगस्त 2026
अंतिम समीक्षा: 14 सितंबर 2026
9 मिनट पठन

कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। अंतिम समीक्षा तिथि ऊपर है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय

स्रोत आधार: RPSC / RSMSSB कला-संस्कृति इकाई (लोक कला, मेले, किले)। सिलेबस विषय; कॉपीराइट सामग्री का पेस्ट नहीं।

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राजस्थान की 5 चित्रकला शैलियाँ — CET/RAS PYQ के साथ (2026 Free Notes)

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बिंदुउत्तर
प्रमुख शैलियाँमेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ (जयपुर), हाड़ौती, किशनगढ़, अलवर, बीकानेर (उस्ता कला)
सबसे प्राचीन शैलीमेवाड़ शैली (चावंड, उदयपुर केंद्र)
सबसे प्रसिद्ध चित्रबणी-ठणी (किशनगढ़ शैली, चित्रकार निहालचंद)
मूल स्रोत/जनक शैलीअपभ्रंश शैली → गुजरात शैली → राजस्थानी शैली
प्रमुख रंग स्रोतहिंगलू (लाल), केसर, गेरू, स्वर्ण-रजत वर्क, इन्डिगो (नील)
उस्ता कला केंद्रबीकानेर (ऊँट की खाल पर सोने की नक्काशी – मांडना/मीनाकारी)
मुगल प्रभाव सर्वाधिकबूँदी व कोटा (हाड़ौती) शैली में

भूमिका

राजस्थान की चित्रकला भारत की मध्यकालीन लघु चित्रकला (Miniature Painting) परंपरा की सबसे समृद्ध शाखाओं में से एक मानी जाती है। यह केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि राजस्थान के राजपूत दरबारों, धार्मिक आस्था, लोक-जीवन और प्रकृति-प्रेम का दस्तावेज़ भी है। हर रियासत ने अपने भौगोलिक परिवेश, शासकों की रुचि और मुगल दरबार से संबंधों के अनुसार अपनी अलग चित्रशैली विकसित की, जिससे राजस्थान में एक नहीं बल्कि कई उप-शैलियाँ जन्मीं।

RPSC, RAS, RSMSSB Patwari, REET जैसी परीक्षाओं में इस टॉपिक से प्रतिवर्ष 2-4 प्रश्न पूछे जाते हैं, विशेषकर बणी-ठणी, चित्रकारों के नाम और शैलियों की विशेषताओं पर आधारित।

1. राजस्थानी चित्रकला का उद्भव एवं विकास

राजस्थानी चित्रकला की जड़ें अपभ्रंश शैली (11वीं-12वीं शताब्दी, जैन ताड़पत्र व हस्तलिखित ग्रंथों पर आधारित चित्रण) में मिलती हैं। समय के साथ यह शैली गुजरात की पश्चिमी भारतीय शैली से प्रभावित होकर स्वतंत्र राजस्थानी रूप में विकसित हुई।

  • प्रारंभिक चरण: 15वीं-16वीं शताब्दी — धार्मिक पांडुलिपियों (जैसे चौरपंचाशिका, गीत गोविंद) का चित्रण।
  • स्वर्ण युग: 17वीं-18वीं शताब्दी — मुगल दरबार से तकनीकी प्रभाव (यथार्थवाद, बारीक रेखांकन) राजपूत दरबारों में प्रवेश करता है, फिर भी हर रियासत अपनी मौलिकता बनाए रखती है।
  • पतन: 19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश प्रभाव व फोटोग्राफी के आगमन से पारंपरिक शैलियाँ धीरे-धीरे क्षीण हुईं।

2. राजस्थान की प्रमुख चित्रकला शैलियाँ

2.1 मेवाड़ शैली (उदयपुर शैली)

  • केंद्र: चावंड (प्रारंभिक), बाद में उदयपुर, नाथद्वारा, देवगढ़
  • काल: 15वीं शताब्दी से; सर्वाधिक प्राचीन व मौलिक राजस्थानी शैली मानी जाती है
  • प्रमुख चित्रकार: नासिरुद्दीन (सर्वप्रथम ज्ञात चित्रकार, जिसने 1605 ई. में "रागमाला" चित्रित की), साहिबदीन, मनोहर
  • विशेषताएँ: चटख रंग (लाल व पीला अधिक प्रयोग), सरल पृष्ठभूमि, कृष्ण-लीला व रागमाला चित्रण की प्रधानता
  • नाथद्वारा उप-शैली: श्रीनाथजी से संबंधित पिछवाई चित्रकला (मंदिर के पीछे लगाए जाने वाले वस्त्र-चित्र) इसी शैली की उपशाखा है

2.2 मारवाड़ शैली (जोधपुर शैली)

  • केंद्र: जोधपुर, पाली, नागौर, किशनगढ़ (प्रारंभ में मारवाड़ की उपशैली)
  • विशेषताएँ: पीले व लाल रंग की प्रधानता, ढोला-मारू, रागमाला व शिकार दृश्यों का चित्रण
  • प्रमुख शासक-संरक्षक: महाराजा मानसिंह (जोधपुर) के काल में नाथ संप्रदाय से जुड़े चित्रों का विशेष प्रचलन रहा

2.3 ढूंढाड़ शैली (जयपुर/आमेर शैली)

  • केंद्र: आमेर, जयपुर, अलवर, उणियारा, शेखावाटी
  • विशेषताएँ: मुगल शैली का सर्वाधिक स्पष्ट प्रभाव; रसिकप्रिया, बारहमासा व दरबारी दृश्यों का चित्रण
  • शेखावाटी उप-शैली: हवेलियों की भित्ति चित्रकला (Fresco/भित्ति चित्र) के लिए प्रसिद्ध — इसे "राजस्थान की खुली आर्ट गैलरी" भी कहा जाता है

2.4 हाड़ौती शैली (बूँदी-कोटा शैली)

  • केंद्र: बूँदी, कोटा
  • विशेषताएँ: हरे रंग का सघन प्रयोग, घने जंगल, शिकार दृश्य (विशेषकर शेर-शिकार), हाथी युद्ध के चित्रण के लिए विख्यात
  • प्रमुख उदाहरण: बूँदी का "रंगमहल" व चित्रशाला — भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध

2.5 किशनगढ़ शैली

  • केंद्र: किशनगढ़ (अजमेर के निकट)
  • संरक्षक शासक: महाराजा सावंतसिंह (उपनाम "नागरीदास")
  • प्रमुख चित्रकार: निहालचंद
  • सबसे प्रसिद्ध चित्र: बणी-ठणी — जिसे भारत की "मोनालिसा" भी कहा जाता है; यह राधा के आदर्श रूप का चित्रण है, जिसकी लंबी आँखें, पतले होंठ व सुडौल मुखाकृति इस शैली की पहचान है

2.6 अलवर शैली

  • केंद्र: अलवर
  • विशेषताएँ: ढूंढाड़ शैली की उपशाखा, बाद में मुगल व यूरोपीय यथार्थवाद से प्रभावित; बारीक रेखांकन व दरबारी चित्रण

2.7 बीकानेर शैली एवं उस्ता कला

  • केंद्र: बीकानेर
  • विशेषताएँ: मुगल व दक्खिनी शैली का मिश्रित प्रभाव
  • उस्ता कला: बीकानेर की विशिष्ट कलाकृति, जिसमें ऊँट की खाल (Camel Hide) पर सोने की नक्काशी व मीनाकारी की जाती है; यह उस्ता परिवार द्वारा विकसित की गई

3. शैलियों की तुलनात्मक तालिका

शैलीकेंद्रविशेष पहचानप्रमुख रंग
मेवाड़उदयपुर, चावंडरागमाला, कृष्ण-लीलालाल-पीला
मारवाड़जोधपुरढोला-मारू, शिकार दृश्यपीला-लाल
ढूंढाड़जयपुर, आमेरमुगल प्रभाव अधिकबहुरंगी
हाड़ौतीबूँदी-कोटाशिकार व हाथी-युद्धहरा
किशनगढ़किशनगढ़बणी-ठणी (राधा चित्रण)हल्के पेस्टल रंग
अलवरअलवरयूरोपीय यथार्थवादबारीक रेखांकन
बीकानेरबीकानेरउस्ता कलास्वर्ण वर्क

4. रंग एवं तकनीक

राजस्थानी चित्रकला में रंग पूर्णतः प्राकृतिक स्रोतों से तैयार किए जाते थे:

  • लाल — हिंगलू व गेरू से
  • पीला — हरताल व केसर से
  • हरा — तांबे के यौगिकों से
  • नीला — नील (Indigo) से
  • सोना/चाँदी — वर्क (Gold/Silver Foil) के रूप में, विशेषकर वस्त्रों व आभूषणों के चित्रण में

चित्र मुख्यतः कपड़े (वस्त्र), हाथी दांत, हस्तनिर्मित कागज व दीवारों (भित्ति चित्र) पर बनाए जाते थे।

5. अन्य उल्लेखनीय उपशैलियाँ

मुख्य सात शैलियों के अतिरिक्त कुछ छोटी किंतु परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण उपशैलियाँ भी विकसित हुईं:

  • उणियारा शैली — ढूंढाड़ शैली की उपशाखा, टोंक क्षेत्र में विकसित; मेवाड़ व जयपुर शैली का मिश्रित प्रभाव देखने को मिलता है
  • नागौर शैली — मारवाड़ शैली की उपशाखा; सरल रेखांकन व स्थानीय लोक-विषयों के चित्रण के लिए जानी जाती है
  • शाहपुरा शैली — भीलवाड़ा क्षेत्र में विकसित, मेवाड़ शैली से प्रभावित परंतु स्वतंत्र पहचान रखती है
  • देवगढ़ शैली — मेवाड़ शैली की उपशाखा; 18वीं-19वीं शताब्दी में शिकार व दरबारी दृश्यों के लिए प्रसिद्ध
  • जैसलमेर शैली — पटवों की हवेली जैसी इमारतों में भित्ति चित्रण व स्वर्ण-वर्क के प्रयोग के लिए विशिष्ट

एग्जाम नोट: RPSC प्रश्नपत्रों में कभी-कभी इन उपशैलियों को उनकी "मूल शैली" से जोड़कर पूछा जाता है (जैसे "उणियारा किस शैली की उपशाखा है?") — इसलिए मूल-उपशैली जोड़े याद रखना उपयोगी रहता है।

6. चित्रकला के प्रमुख विषय (Themes)

राजस्थानी लघु चित्रकला में विषय-वस्तु मुख्यतः निम्न श्रेणियों में विभाजित की जा सकती है:

विषय श्रेणीउदाहरणसर्वाधिक संबंधित शैली
धार्मिक/पौराणिककृष्ण-लीला, रामायण प्रसंगमेवाड़
संगीत आधारितरागमाला (राग-रागिनियों का मानवीकरण)मेवाड़, मारवाड़
प्रेम-काव्यढोला-मारू, बारहमासा, रसिकप्रियामारवाड़, ढूंढाड़
दरबारी जीवनराज्याभिषेक, दरबार दृश्य, जुलूसढूंढाड़, अलवर
शिकार दृश्यशेर-शिकार, हाथी-युद्धहाड़ौती
नारी सौंदर्यआदर्श नायिका चित्रण (बणी-ठणी)किशनगढ़
लोक-जीवनग्रामीण दृश्य, त्यौहारमारवाड़, नागौर

इन विषयों का ज्ञान परीक्षा में "चित्र देखकर शैली पहचानो" प्रकार के प्रश्नों में विशेष सहायक होता है।

7. संग्रहण एवं संग्रहालय

राजस्थानी चित्रकला के मूल एवं ऐतिहासिक चित्र आज निम्न प्रमुख संस्थानों में संरक्षित हैं:

  • महाराणा प्रताप संग्रहालय व सिटी पैलेस संग्रहालय, उदयपुर — मेवाड़ शैली के दुर्लभ संग्रह
  • अलबर्ट हॉल संग्रहालय, जयपुर — ढूंढाड़ व अन्य शैलियों के प्रतिनिधि चित्र
  • राजस्थान राज्य पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, बीकानेर व जोधपुर शाखाएँ
  • किशनगढ़ का दरबार संग्रहालय — बणी-ठणी की मूल प्रति सहित नागरीदास कालीन संग्रह

कई निजी संग्रह व हवेलियाँ (विशेषकर शेखावाटी क्षेत्र में) भी भित्ति चित्रों के रूप में जीवंत संग्रहालय का कार्य करती हैं।

8. वर्तमान स्थिति एवं संरक्षण के प्रयास

स्वतंत्रता के पश्चात राजस्थानी लघु चित्रकला की परंपरा को जीवित रखने हेतु कई प्रयास हुए हैं:

  • जयपुर, उदयपुर व नाथद्वारा में आज भी पारंपरिक चित्रकार परिवार (विशेषकर पिछवाई कला में) सक्रिय हैं
  • राज्य सरकार द्वारा हस्तशिल्प व लघु उद्योग बोर्ड के माध्यम से चित्रकारों को प्रशिक्षण व बाज़ार सहायता उपलब्ध कराई जाती है
  • पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु उदयपुर, जयपुर व बीकानेर में चित्रकला कार्यशालाएँ (Art Workshops) आयोजित होती हैं, जहाँ पर्यटक पारंपरिक तकनीक सीख सकते हैं
  • नाथद्वारा की पिछवाई कला व बीकानेर की उस्ता कला को हस्तशिल्प निर्यात के माध्यम से राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिल रही है

सत्यापन नोट: यदि किसी विशिष्ट GI Tag (भौगोलिक संकेतक) दर्जे की जानकारी चाहिए, तो कृपया वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक GI रजिस्ट्री पोर्टल से पुष्टि करें, क्योंकि यह सूची समय-समय पर अद्यतन होती रहती है।

Exam Trap (परीक्षा में भ्रम पैदा करने वाले बिंदु)

  1. बणी-ठणी बनाम मोनालिसा — बणी-ठणी को "भारत की मोनालिसा" कहा जाता है, परंतु यह किशनगढ़ शैली का चित्र है, मेवाड़ शैली का नहीं। चित्रकार निहालचंद थे, न कि साहिबदीन।
  2. नासिरुद्दीन का रागमाला (1605 ई.) — यह चावंड (मेवाड़ शैली) से संबंधित है, जोधपुर से नहीं।
  3. उस्ता कला बनाम पिछवाई कला — उस्ता कला बीकानेर की है (ऊँट की खाल पर स्वर्ण नक्काशी), जबकि पिछवाई कला नाथद्वारा (मेवाड़ शैली की उपशाखा) से संबंधित है — दोनों को न मिलाएँ।
  4. शेखावाटी भित्ति चित्रकला ढूंढाड़ शैली की उपशाखा मानी जाती है, स्वतंत्र शैली नहीं।
  5. हरे रंग की प्रधानता व शिकार दृश्य पूछे जाने पर उत्तर हाड़ौती (बूँदी-कोटा) होगा, मेवाड़ नहीं — विद्यार्थी अक्सर इसे मेवाड़ से जोड़कर गलती करते हैं।

Memory Tricks (याद रखने की तकनीक)

"मे-मा-ढूं-हा-कि" फॉर्मूला:

  • मेवाड़ → मेहरून लाल (लाल-पीला रंग)
  • मारवाड़ → मारू-ढोला (शिकार दृश्य)
  • ढूंढाड़ → ढूंढो मुगल असर (सर्वाधिक मुगल प्रभाव)
  • हाड़ौती → हाथी-शेर हरा (हरा रंग, शिकार)
  • किशनगढ़ → कितनी सुंदर बणी-ठणी (राधा का आदर्श चित्रण)

Teacher's Commentary (गुरु मंत्र)

अनुभव यह बताता है कि छात्र चित्रकला शैलियों के "केंद्र" और "पहचान-चिह्न" को अलग-अलग याद करने की बजाय जोड़े में याद करते हैं तो भ्रम कम होता है — जैसे "किशनगढ़ = बणी-ठणी = निहालचंद" को एक इकाई मानकर पढ़ें, अलग-अलग रट्टा न लगाएं। साथ ही, प्रश्नपत्रों में अक्सर चित्रकार के नाम की जगह शासक (संरक्षक) का नाम पूछा जाता है (जैसे सावंतसिंह "नागरीदास") — इसलिए संरक्षक व चित्रकार दोनों नाम साथ याद करें।

PYQs / अभ्यास प्रश्न (MCQs)

प्रश्न 1. "बणी-ठणी" चित्र किस शैली से संबंधित है? (अ) मेवाड़ (ब) किशनगढ़ (स) हाड़ौती (द) बीकानेर उत्तर: (ब) किशनगढ़

प्रश्न 2. उस्ता कला मुख्यतः किस जिले से संबंधित है? (अ) जोधपुर (ब) बीकानेर (स) कोटा (द) अलवर उत्तर: (ब) बीकानेर

प्रश्न 3. चावंड शैली में सर्वप्रथम रागमाला किसने चित्रित की? (अ) निहालचंद (ब) साहिबदीन (स) नासिरुद्दीन (द) मनोहर उत्तर: (स) नासिरुद्दीन

प्रश्न 4. हाड़ौती शैली में किस रंग की प्रधानता पाई जाती है? (अ) लाल (ब) पीला (स) हरा (द) नीला उत्तर: (स) हरा

प्रश्न 5. शेखावाटी भित्ति चित्रकला किस शैली की उपशाखा मानी जाती है? (अ) मारवाड़ (ब) ढूंढाड़ (स) मेवाड़ (द) हाड़ौती उत्तर: (ब) ढूंढाड़


E-E-A-T लेखक टिप्पणी

यह लेख Suyog Academy की टीम — योगेश, सुधीर ढाका व महेंद्र ढाका — द्वारा RPSC, RAS, RSMSSB एवं अन्य राजस्थान राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के आधिकारिक पाठ्यक्रम के अनुरूप तैयार किया गया है। लेखक टीम को राजस्थान की कला-संस्कृति व सरकारी भर्ती परीक्षाओं की विषय-वस्तु पर विशेष अनुभव प्राप्त है। तथ्यात्मक शुद्धता हेतु कृपया ऊपर दी गई सत्यापन सलाह अवश्य पढ़ें।


अंतिम संशोधन (Last Updated): 14 सितंबर 2026
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Sudhir Sirइतिहास विशेषज्ञलेखक परिचय
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महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

मेवाड़ शैली को राजस्थान की सबसे प्राचीन व मौलिक चित्रकला शैली माना जाता है, जिसका केंद्र प्रारंभ में चावंड था।

बणी-ठणी चित्र किशनगढ़ शैली के चित्रकार निहालचंद ने महाराजा सावंतसिंह (नागरीदास) के काल में बनाया।

उस्ता कला बीकानेर की एक विशिष्ट कलाकृति है जिसमें ऊँट की खाल पर सोने की बारीक नक्काशी व मीनाकारी की जाती है।

ढूंढाड़ (जयपुर/आमेर) शैली में मुगल दरबार का प्रभाव सर्वाधिक स्पष्ट रूप से देखा जाता है।

पिछवाई चित्रकला नाथद्वारा (मेवाड़ शैली की उपशाखा) से संबंधित है और श्रीनाथजी मंदिर से जुड़ी है।

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