सुयोग अकादमी (Suyog Academy)
suyogacademy.com — RPSC & RSMSSB फ्री GK नोट्स
राजस्थान इतिहास

मारवाड़ लोक परिषद व प्रजामंडल — CET/RAS PYQ के साथ (2026 Free Notes)

Sudhir SirSudhir Sir (इतिहास विशेषज्ञ)
14 सितंबर 2026
अंतिम समीक्षा: 14 सितंबर 2026
24 मिनट पठन

कैसे बना: यह नोट सुयोग अकादमी के लेखक ने परीक्षा सिलेबस के अनुसार लिखा/संपादित किया है। अंतिम समीक्षा तिथि ऊपर है। त्रुटि दिखे तो संपर्क करें। टीम परिचय

स्रोत आधार: RPSC RAS / RSMSSB CET पाठ्यक्रम — राजस्थान इतिहास इकाई। पाठ्यपुस्तक पृष्ठ यहाँ नहीं चिपकाए गए।

शेयर करें:
मारवाड़ लोक परिषद व प्रजामंडल — CET/RAS PYQ के साथ (2026 Free Notes)

सुयोग AI गुरु

नोट्स के मुख्य बिंदु, मॉक MCQ या डाउट पूछें

मारवाड़ लोक परिषद एवं प्रजामंडल आंदोलन राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन और देशी रियासतों में उत्तरदायी शासन की मांग के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। जोधपुर रियासत में राजनीतिक जागृति अचानक पैदा नहीं हुई थी। इसके पीछे मारवाड़ हितकारिणी सभा, मारवाड़ प्रजामंडल, नागरिक अधिकारों के लिए हुए प्रयास, किसान असंतोष और जागीरदारी व्यवस्था के विरुद्ध बढ़ती जनचेतना का लंबा क्रम था। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में मई 1938 में मारवाड़ लोक परिषद का गठन हुआ और आगे चलकर इस संगठन ने उत्तरदायी शासन, नागरिक स्वतंत्रता तथा किसानों के अधिकारों के सवाल को व्यापक रूप दिया।

प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे RPSC, राजस्थान CET, REET, पटवारी, ग्राम विकास अधिकारी (VDO), राजस्थान पुलिस और अन्य राजस्थान GK आधारित परीक्षाओं में मारवाड़ लोक परिषद से संबंधित प्रश्न अक्सर स्थापना वर्ष, संस्थापक/प्रमुख नेता, उद्देश्य, चण्डावल काण्ड, डाबड़ा काण्ड और जय नारायण व्यास जैसे विषयों से पूछे जाते हैं। इसलिए इस लेख में केवल घटनाओं की सूची न देकर पूरे आंदोलन को क्रमवार समझाया गया है।

राजस्थान के आधुनिक इतिहास के अन्य आंदोलनों के लिए राजस्थान इतिहास के संपूर्ण नोट्स भी देखें। किसान आंदोलनों की पृष्ठभूमि समझने के लिए राजस्थान के किसान आंदोलन वाला विस्तृत नोट भी उपयोगी है।

मारवाड़ लोक परिषद क्या थी?

मारवाड़ लोक परिषद जोधपुर अर्थात मारवाड़ रियासत में उत्तरदायी शासन और जनता के राजनीतिक अधिकारों की मांग करने वाला प्रमुख राजनीतिक संगठन था। इसका गठन 16 मई 1938 को हुआ। इसके प्रारंभिक संगठन में रणछोड़दास गट्टानी और अभयमल जैन जैसे नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद के वर्षों में जय नारायण व्यास इसके सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हुए।

लोक परिषद के गठन का उद्देश्य केवल किसी एक कर या स्थानीय शिकायत का समाधान नहीं था। इसका व्यापक लक्ष्य था कि मारवाड़ में शासन जनता की भागीदारी और प्रतिनिधियों के माध्यम से चले। संगठन ने नागरिक स्वतंत्रता, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, सभा और संगठन की स्वतंत्रता तथा किसानों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई।

मारवाड़ लोक परिषद को समझने के लिए यह अंतर ध्यान रखना जरूरी है कि मारवाड़ प्रजामंडल 1934 में अस्तित्व में आया था, जबकि मारवाड़ लोक परिषद का गठन 1938 में हुआ। दोनों एक ही राजनीतिक जागरण की अलग-अलग अवस्थाओं से जुड़े संगठन थे, लेकिन इन्हें एक ही संगठन मानना सही नहीं है।

मारवाड़ में राजनीतिक चेतना की पृष्ठभूमि

मारवाड़ में राजनीतिक जागरण का इतिहास लोक परिषद से पहले का है। जोधपुर रियासत में शासकीय व्यवस्था अत्यधिक केंद्रीकृत थी और आम जनता को शासन में प्रत्यक्ष राजनीतिक भागीदारी के अवसर सीमित थे। दूसरी ओर जागीरदारी व्यवस्था के कारण किसानों को विभिन्न प्रकार के कर, लाग-बाग, बेगार और अन्य आर्थिक दबावों का सामना करना पड़ता था।

बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में सामाजिक सुधार और राजनीतिक चेतना से जुड़े संगठनों ने लोगों को संगठित करना शुरू किया। बाद में मारवाड़ हितकारिणी सभा और अन्य संस्थाओं के माध्यम से राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, सामाजिक समस्याओं और जनता की कठिनाइयों पर चर्चा बढ़ी।

जय नारायण व्यास इस राजनीतिक जागरण के प्रमुख व्यक्तित्वों में उभरे। उन्होंने मारवाड़ की समस्याओं को सार्वजनिक बहस का विषय बनाया और उत्तरदायी शासन की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके लेखन और राजनीतिक गतिविधियों के कारण राज्य सरकार उनसे असहमत थी और उन्हें दमन का सामना करना पड़ा।

मारवाड़ हितकारिणी सभा और राजनीतिक जागरण

मारवाड़ में राजनीतिक आंदोलन की शुरुआती कड़ियों में मारवाड़ हितकारिणी सभा का नाम महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य मारवाड़ के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हितों के लिए काम करना था। समय के साथ इस संस्था की गतिविधियां अधिक राजनीतिक होती गईं।

जय नारायण व्यास और उनके सहयोगियों ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की आलोचना की। मारवाड़ की स्थिति पर प्रकाशित साहित्य ने भी जनता के बीच राजनीतिक जागरूकता पैदा की। राज्य सरकार ने इन गतिविधियों को अपने विरुद्ध माना और आंदोलनकारियों पर कार्रवाई की।

इसी दौर में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां, निर्वासन और सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध जैसी कार्रवाइयां बढ़ीं। इससे आंदोलन समाप्त होने के बजाय राजनीतिक असंतोष और बढ़ा।

मारवाड़ प्रजामंडल की स्थापना

1934 में मारवाड़ प्रजामंडल का गठन हुआ। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार इसके गठन में भंवरलाल सर्राफ, अभयमल जैन और अचलेश्वर प्रसाद शर्मा जैसे कार्यकर्ताओं की भूमिका रही। इसका मुख्य उद्देश्य नागरिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन की मांग को आगे बढ़ाना था।

राज्य सरकार ने प्रजामंडल की गतिविधियों को स्वीकार नहीं किया और संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद आंदोलनकारियों ने अलग-अलग संगठनों और मंचों के माध्यम से नागरिक अधिकारों की लड़ाई जारी रखी। सिविल लिबर्टीज यूनियन भी इसी राजनीतिक वातावरण में सामने आया, लेकिन उस पर भी सरकारी कार्रवाई हुई।

1936-37 तक मारवाड़ में राजनीतिक संगठनों पर नियंत्रण और गिरफ्तारियों का सिलसिला तेज हो गया। अचलेश्वर प्रसाद शर्मा सहित कई कार्यकर्ताओं को जेल जाना पड़ा। जब प्रजामंडल और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े संगठनों के लिए काम करना कठिन बना दिया गया, तब एक नए व्यापक राजनीतिक मंच की आवश्यकता महसूस हुई। इसी पृष्ठभूमि में 1938 में मारवाड़ लोक परिषद का गठन हुआ।

मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना 16 मई 1938

मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना 16 मई 1938 को हुई। इसके प्रारंभिक नेतृत्व में रणछोड़दास गट्टानी और अभयमल जैन प्रमुख थे। संगठन का मूल उद्देश्य मारवाड़ में महाराजा की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था।

यहां एक महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य है कि संगठन के नाम में “लोक” शब्द का प्रयोग किया गया। आंदोलन के राजनीतिक विचार में जनता की भूमिका को अधिक महत्व दिया जा रहा था। जय नारायण व्यास उस समय राज्य से बाहर थे, लेकिन वे मारवाड़ की राजनीतिक चेतना के प्रमुख प्रेरक बने हुए थे।

लोक परिषद का गठन उस समय हुआ जब पूरे भारत में देशी रियासतों के अंदर प्रजा के राजनीतिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन की मांग तेज हो रही थी। 1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के बाद देशी राज्यों में राजनीतिक संगठनों की गतिविधियों को नया बल मिला। मारवाड़ लोक परिषद भी इसी व्यापक राजनीतिक वातावरण से प्रभावित थी।

मारवाड़ लोक परिषद के प्रमुख उद्देश्य

  • मारवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना।
  • जनता को शासन में प्रतिनिधित्व दिलाना।
  • नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना।
  • राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग करना।
  • सभा, संगठन और राजनीतिक गतिविधियों पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध करना।
  • किसानों पर होने वाले अत्याचारों और अवैध वसूली के विरुद्ध आवाज उठाना।
  • बेगार और विभिन्न प्रकार की लाग-बाग तथा अवैध कर वसूली का विरोध करना।
  • जागीरदारों के अत्याचारों के विरुद्ध किसानों को राजनीतिक रूप से जागरूक करना।
  • राज्य प्रशासन में जनता की भागीदारी बढ़ाना।

जय नारायण व्यास और मारवाड़ आंदोलन

जय नारायण व्यास मारवाड़ के राजनीतिक जागरण के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में से एक थे। उन्होंने राज्य की निरंकुश प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के प्रतिबंधों का विरोध किया। उनके राजनीतिक जीवन का बड़ा हिस्सा मारवाड़ में उत्तरदायी शासन की मांग से जुड़ा रहा।

व्यास के लिए राजनीतिक आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं था। वे जनता को राजनीतिक अधिकार देने, प्रतिनिधि संस्थाओं को मजबूत करने और नागरिक स्वतंत्रता स्थापित करने की मांग कर रहे थे। इसी कारण उनका नाम मारवाड़ हितकारिणी सभा, मारवाड़ प्रजामंडल और बाद में मारवाड़ लोक परिषद के संघर्ष से लगातार जुड़ा दिखाई देता है।

1938 में लोक परिषद के गठन के समय जय नारायण व्यास राज्य से बाहर थे। बाद में उन पर लगे प्रतिबंध हटाए गए और वे मारवाड़ की राजनीति में फिर सक्रिय हुए। 1940 में लोक परिषद को पुनः मान्यता मिलने के बाद जुलाई में हुए प्रतिनिधि अधिवेशन में जय नारायण व्यास को परिषद का अध्यक्ष चुना गया।

1938-39: संगठन का विस्तार

स्थापना के बाद लोक परिषद ने अपने संगठन को मारवाड़ के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाने का प्रयास किया। इसका उद्देश्य केवल जोधपुर शहर तक सीमित रहना नहीं था। ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों और जागीर क्षेत्रों में राजनीतिक जागरूकता फैलाने पर भी जोर दिया गया।

किसानों की समस्याएं इस समय तेजी से राजनीतिक मुद्दा बन रही थीं। जागीर क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की वसूली, बेगार और अन्य स्थानीय प्रथाओं के विरुद्ध असंतोष था। लोक परिषद ने इन मुद्दों को उत्तरदायी शासन की मांग से जोड़ा।

1939 में जोधपुर क्षेत्र में अकाल और आर्थिक संकट ने ग्रामीण समाज की स्थिति को और कठिन बना दिया। लोक परिषद ने राहत व्यवस्था, प्रशासनिक नीतियों और जागीरदारों की भूमिका पर सवाल उठाए। भारत छोड़ो आंदोलन से पहले ही मारवाड़ में राजनीतिक और किसान आंदोलनों का आधार तैयार हो चुका था।

मारवाड़ लोक परिषद पर सरकारी प्रतिबंध

राज्य सरकार लोक परिषद की बढ़ती गतिविधियों से चिंतित थी। राजनीतिक सभाओं और संगठनात्मक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए गए। अंततः 29 मार्च 1940 को मारवाड़ लोक परिषद और उसकी शाखाओं को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।

इस प्रतिबंध के बाद आंदोलनकारियों ने संघर्ष जारी रखा। मथुरादास माथुर को परिषद का पहला “डिक्टेटर” बनाया गया और उन्हें अप्रैल 1940 में गिरफ्तार कर लिया गया। रणछोड़दास गट्टानी सहित अन्य नेताओं पर भी कार्रवाई हुई।

यह दौर आंदोलन के लिए कठिन था, लेकिन प्रतिबंध से संगठन का राजनीतिक प्रभाव समाप्त नहीं हुआ। बल्कि गिरफ्तारियों और दमन ने नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्न को और प्रमुख बना दिया।

1940 में लोक परिषद की पुनः मान्यता

1940 में जोधपुर की राजनीतिक स्थिति पर राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान गया। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व से जुड़े अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के प्रयासों के माध्यम से जोधपुर की स्थिति की जानकारी जुटाई गई। द्वारकानाथ काचरू ने जोधपुर की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन किया।

इसके बाद जून 1940 के आसपास समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ी और लोक परिषद को फिर से काम करने की अनुमति मिली। राजनीतिक बंदियों की रिहाई भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनी। जुलाई 1940 में परिषद के प्रतिनिधि अधिवेशन में जय नारायण व्यास को अध्यक्ष चुना गया।

यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि लगातार सरकारी दमन के बावजूद लोक परिषद को समाप्त नहीं किया जा सका। संगठन को अंततः राजनीतिक वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना पड़ा।

1941: जोधपुर नगरपालिका में लोक परिषद का प्रभाव

1941 के जोधपुर नगरपालिका चुनाव में मारवाड़ लोक परिषद सबसे बड़े राजनीतिक समूह के रूप में उभरी। जय नारायण व्यास जोधपुर नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष बने। यह लोक परिषद के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि थी क्योंकि पहली बार संगठन ने शहरी स्थानीय शासन के स्तर पर अपनी लोकप्रियता का प्रभाव दिखाया।

इसके बाद परिषद की गतिविधियां ग्रामीण और जागीर क्षेत्रों में भी अधिक सक्रिय हुईं। कार्यकर्ताओं ने किसानों को उनके अधिकारों, अवैध करों और जागीरदारी व्यवस्था की समस्याओं के बारे में जागरूक किया।

मारवाड़ किसान आंदोलन और लोक परिषद

मारवाड़ लोक परिषद का आंदोलन केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं रहा। धीरे-धीरे इसका संबंध किसान प्रश्न से भी मजबूत हुआ। मारवाड़ के किसानों पर लगान, लाग-बाग, बेगार और अन्य स्थानीय वसूली का दबाव था। जागीर क्षेत्रों में किसानों के अधिकारों की स्थिति विशेष रूप से कमजोर थी।

लोक परिषद ने किसानों की समस्याओं को राजनीतिक आंदोलन से जोड़ा। बाद में मारवाड़ किसान सभा भी किसान हितों के लिए सक्रिय हुई। दोनों धाराओं ने कई मुद्दों पर जागीरदारी व्यवस्था और किसानों के शोषण का विरोध किया।

इस विषय का विस्तृत अध्ययन करने के लिए राजस्थान के किसान आंदोलनों के नोट्स देखें। वहां बिजोलिया, बेगूं, शेखावाटी, मारवाड़ और अन्य किसान आंदोलनों की तुलना भी की जा सकती है।

जागीरदारी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष

मारवाड़ में जागीरदारों को कई प्रकार के प्रशासनिक और आर्थिक अधिकार प्राप्त थे। किसानों से विभिन्न प्रकार की वसूली और श्रम लिया जाता था। लोक परिषद के विस्तार के साथ इन समस्याओं को सार्वजनिक राजनीतिक मुद्दा बनाया गया।

लोक परिषद के कार्यकर्ताओं का तर्क था कि केवल राज्य के शासन में परिवर्तन पर्याप्त नहीं होगा। ग्रामीण जनता को भी वास्तविक अधिकार मिलना चाहिए। इसलिए किसान प्रश्न और उत्तरदायी शासन की मांग एक-दूसरे से जुड़ते गए।

यही कारण है कि 1940 के बाद मारवाड़ लोक परिषद का आंदोलन शहरों से निकलकर गांवों और जागीर क्षेत्रों में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। जागीरदार वर्ग ने इसे अपने हितों के लिए चुनौती के रूप में देखा और कई स्थानों पर परिषद कार्यकर्ताओं का विरोध किया।

1942 का चण्डावल प्रकरण

28 मार्च 1942 को मारवाड़ लोक परिषद ने चण्डावल में उत्तरदायी शासन दिवस मनाने का निर्णय लिया। यह कार्यक्रम उस समय आयोजित किया जा रहा था जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो चुका था और देशी रियासतों में भी राजनीतिक अधिकारों की मांग बढ़ रही थी।

चण्डावल में लोक परिषद के कार्यकर्ताओं के कार्यक्रम का स्थानीय जागीरदार पक्ष ने विरोध किया। उपलब्ध विवरणों के अनुसार परिषद के कार्यकर्ताओं पर हमला हुआ और कई लोग घायल हुए। यह घटना मारवाड़ में जागीरदारों और लोक परिषद के बीच बढ़ते टकराव का महत्वपूर्ण उदाहरण बनी।

इसके बाद मारवाड़ में जागीरी अत्याचारों के विरुद्ध विरोध और तेज हुआ। 1942 की घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि राजनीतिक संघर्ष अब केवल जोधपुर दरबार और राजनीतिक नेताओं के बीच नहीं था, बल्कि ग्रामीण समाज और जागीरदारी व्यवस्था के बीच भी सीधा टकराव बन चुका था।

बालमुकुंद बिस्सा और 1942 का संघर्ष

बालमुकुंद बिस्सा मारवाड़ लोक परिषद से जुड़े प्रमुख कार्यकर्ताओं में थे। उन्होंने राजनीतिक बंदियों और नागरिक अधिकारों के मुद्दे पर संघर्ष किया। 1942 में उन्होंने जेल में भूख हड़ताल की। गंभीर शारीरिक स्थिति के बाद उनका निधन 19 जून 1942 को जोधपुर के विंडहैम अस्पताल में हुआ।

बिस्सा की मृत्यु ने मारवाड़ के राजनीतिक आंदोलन को गहरा भावनात्मक और राजनीतिक प्रभाव दिया। उनके अंतिम संस्कार से संबंधित सरकारी प्रतिबंधों ने भी राज्य की दमनकारी नीति की आलोचना को बढ़ाया।

महात्मा गांधी ने भी मारवाड़ की राजनीतिक स्थिति और लोक परिषद के कार्यकर्ताओं पर हुए अत्याचारों पर ध्यान दिया था। 1942 में उन्होंने जोधपुर के राजनीतिक संघर्ष और परिषद की मांगों के संबंध में लिखा।

भारत छोड़ो आंदोलन और मारवाड़

अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के बाद मारवाड़ की राजनीतिक स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। लोक परिषद से जुड़े कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय आंदोलन के समर्थन में गतिविधियां कीं। राज्य सरकार ने गिरफ्तारियां और नजरबंदी शुरू की।

जय नारायण व्यास सहित कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार या नजरबंद किया गया। मारवाड़ में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन और रियासत के अंदर उत्तरदायी शासन की मांग एक-दूसरे से जुड़ गईं।

यह समझना जरूरी है कि देशी रियासतों में आंदोलन का एक अलग आयाम था। यहां संघर्ष केवल ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध नहीं था, बल्कि स्थानीय निरंकुश शासन और नागरिक अधिकारों की कमी के विरुद्ध भी था। मारवाड़ लोक परिषद इसी दोहरी राजनीतिक परिस्थिति में सक्रिय रही।

1942 के बाद आंदोलन की स्थिति

1942 के बाद सरकारी दमन, गिरफ्तारियों और युद्धकालीन परिस्थितियों के कारण आंदोलन की गति में उतार-चढ़ाव आया। फिर भी लोक परिषद की राजनीतिक मांगें समाप्त नहीं हुईं। उत्तरदायी शासन, नागरिक अधिकार और किसानों की समस्याएं लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी रहीं।

1944 तक कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं की रिहाई हुई और राजनीतिक गतिविधियों को फिर से संगठित करने की संभावना बढ़ी। युद्ध के अंतिम वर्षों में भारत की स्वतंत्रता की संभावना स्पष्ट होने लगी थी। इसका सीधा असर जोधपुर जैसी रियासतों की राजनीति पर पड़ा।

मारवाड़ लोक परिषद और डाबड़ा काण्ड, 1947

मारवाड़ के किसान आंदोलन के इतिहास में 13 मार्च 1947 का डाबड़ा काण्ड अत्यंत महत्वपूर्ण है। डाबड़ा उस समय डीडवाना क्षेत्र में था। लोक परिषद और किसान सभा से जुड़े नेताओं ने वहां किसानों की सभा आयोजित करने का प्रयास किया।

उपलब्ध जिला गजेटियर आधारित विवरण के अनुसार सभा शुरू होने से पहले ही जागीरदारों के समर्थकों और किसानों के बीच संघर्ष हो गया, जिसमें दोनों पक्षों को जान-माल की क्षति हुई। इसलिए डाबड़ा की घटना को केवल सामान्य राजनीतिक सभा के रूप में देखना उचित नहीं है। यह मारवाड़ में जागीरदारी व्यवस्था के विरुद्ध बढ़ते किसान संघर्ष और राजनीतिक संगठन के बीच टकराव का चरम उदाहरण थी।

डाबड़ा की घटना को लेकर विभिन्न पुस्तकों और परीक्षा सामग्री में मृतकों की संख्या अलग-अलग दी जाती है। इसलिए तथ्यात्मक अध्ययन में बिना प्राथमिक स्रोत के किसी एक संख्या को अंतिम मानना उचित नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न अधिकतर 13 मार्च 1947, डाबड़ा, लोक परिषद-किसान सभा और जागीरदारी विरोध के संबंध में पूछे जाते हैं।

डाबड़ा काण्ड का महत्व

डाबड़ा काण्ड से स्पष्ट हुआ कि 1947 तक मारवाड़ का किसान प्रश्न केवल आर्थिक समस्या नहीं रहा था। यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व, भूमि अधिकार और जागीरदारी व्यवस्था के भविष्य से जुड़ चुका था।

लोक परिषद और किसान संगठनों के बीच सहयोग ने ग्रामीण जनता को संगठित करने में भूमिका निभाई। दूसरी ओर जागीरदारों की प्रतिक्रिया ने यह दिखाया कि सत्ता और भूमि संबंधों में परिवर्तन का प्रश्न कितना गंभीर हो चुका था।

भारत की स्वतंत्रता से कुछ ही महीने पहले हुई यह घटना मारवाड़ के राजनीतिक संक्रमण की अंतिम महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी।

मारवाड़ लोक परिषद और उत्तरदायी शासन की मांग

मारवाड़ लोक परिषद के पूरे आंदोलन का केंद्रीय राजनीतिक विचार उत्तरदायी शासन था। इसका अर्थ था कि शासन केवल शासक और उसके नियुक्त अधिकारियों के हाथ में न रहे, बल्कि जनता के प्रतिनिधियों की भी वास्तविक भूमिका हो।

इस मांग का संबंध आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव से था। जनता को सभा, संगठन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिले, राजनीतिक बंदियों को रिहा किया जाए और प्रशासन जनता के प्रति उत्तरदायी बने, यही आंदोलन की व्यापक दिशा थी।

इस दृष्टि से मारवाड़ लोक परिषद को केवल एक क्षेत्रीय संगठन मानना अधूरा होगा। यह राजस्थान की रियासतों में चल रहे व्यापक प्रजामंडल आंदोलनों का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

मारवाड़ प्रजामंडल और मारवाड़ लोक परिषद में अंतर

आधारमारवाड़ प्रजामंडलमारवाड़ लोक परिषद
स्थापना193416 मई 1938
मुख्य क्षेत्रमारवाड़/जोधपुर रियासतमारवाड़/जोधपुर रियासत
मुख्य मांगनागरिक अधिकार एवं उत्तरदायी शासनउत्तरदायी शासन, नागरिक अधिकार एवं जनप्रतिनिधित्व
प्रमुख कार्यकर्ताभंवरलाल सर्राफ, अभयमल जैन, अचलेश्वर प्रसाद शर्मा आदिरणछोड़दास गट्टानी, अभयमल जैन, जय नारायण व्यास, मथुरादास माथुर आदि
ऐतिहासिक भूमिकाप्रारंभिक राजनीतिक संगठन1938 के बाद प्रमुख राजनीतिक मंच

मारवाड़ लोक परिषद आंदोलन की प्रमुख घटनाओं की Timeline

वर्ष/तिथिघटना
1934मारवाड़ प्रजामंडल का गठन
1936-37राजनीतिक संगठनों और कार्यकर्ताओं पर सरकारी दमन बढ़ा
16 मई 1938मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना
1939अकाल और किसान समस्याओं के बीच लोक परिषद की ग्रामीण गतिविधियां बढ़ीं
29 मार्च 1940मारवाड़ लोक परिषद को गैरकानूनी घोषित किया गया
अप्रैल 1940मथुरादास माथुर को आंदोलन का प्रथम “डिक्टेटर” बनाया गया और गिरफ्तार किया गया
जून 1940समझौते के बाद परिषद को पुनः मान्यता मिली
जुलाई 1940जय नारायण व्यास परिषद के अध्यक्ष चुने गए
1941जोधपुर नगरपालिका में लोक परिषद का प्रभाव बढ़ा और जय नारायण व्यास अध्यक्ष बने
28 मार्च 1942चण्डावल में उत्तरदायी शासन दिवस और उसके बाद संघर्ष
19 जून 1942बालमुकुंद बिस्सा का निधन
अगस्त 1942भारत छोड़ो आंदोलन के साथ मारवाड़ में राजनीतिक दमन तेज हुआ
13 मार्च 1947डाबड़ा काण्ड

परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य

  • मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना: 16 मई 1938
  • मुख्य प्रारंभिक नेता: रणछोड़दास गट्टानी और अभयमल जैन
  • प्रमुख बाद के नेता: जय नारायण व्यास
  • मुख्य उद्देश्य: उत्तरदायी शासन की स्थापना
  • मारवाड़ प्रजामंडल: 1934
  • लोक परिषद को गैरकानूनी घोषित किया गया: 29 मार्च 1940
  • प्रथम डिक्टेटर: मथुरादास माथुर
  • लोक परिषद की पुनः मान्यता: 1940
  • जोधपुर नगरपालिका में लोक परिषद का प्रभाव: 1941
  • चण्डावल प्रकरण: 28 मार्च 1942
  • बालमुकुंद बिस्सा का निधन: 19 जून 1942
  • डाबड़ा काण्ड: 13 मार्च 1947

मारवाड़ लोक परिषद आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेता

जय नारायण व्यास

जय नारायण व्यास मारवाड़ के प्रमुख राजनीतिक नेता और उत्तरदायी शासन के समर्थक थे। उन्होंने मारवाड़ की जनता में राजनीतिक चेतना पैदा करने और नागरिक अधिकारों की मांग को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में वे लोक परिषद के प्रमुख नेताओं में रहे।

रणछोड़दास गट्टानी

रणछोड़दास गट्टानी मारवाड़ लोक परिषद के प्रारंभिक नेतृत्व से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। परिषद की स्थापना और शुरुआती संगठनात्मक गतिविधियों में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही।

अभयमल जैन

अभयमल जैन मारवाड़ की राजनीतिक गतिविधियों से लंबे समय तक जुड़े रहे। वे मारवाड़ प्रजामंडल और बाद में लोक परिषद से संबंधित संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय थे।

मथुरादास माथुर

मथुरादास माथुर 1940 में लोक परिषद पर प्रतिबंध के बाद आंदोलन के प्रमुख सत्याग्रही नेताओं में रहे। उन्हें परिषद का प्रथम “डिक्टेटर” बनाया गया और गिरफ्तार किया गया।

बालमुकुंद बिस्सा

बालमुकुंद बिस्सा लोक परिषद से जुड़े कार्यकर्ता थे। 1942 में जेल में भूख हड़ताल के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ी और 19 जून 1942 को उनका निधन हुआ। उनका बलिदान मारवाड़ के राजनीतिक आंदोलन की स्मृति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

मारवाड़ लोक परिषद आंदोलन की विशेषताएं

  1. यह आंदोलन उत्तरदायी शासन की मांग पर केंद्रित था।
  2. इसमें नागरिक स्वतंत्रता का प्रश्न महत्वपूर्ण था।
  3. आंदोलन ने शहरी राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ ग्रामीण जनता को भी जोड़ा।
  4. किसान समस्याएं आंदोलन के महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हुईं।
  5. जागीरदारी व्यवस्था के विरुद्ध राजनीतिक चेतना बढ़ी।
  6. सरकारी प्रतिबंध और गिरफ्तारियां आंदोलन की प्रमुख चुनौतियां थीं।
  7. 1940 में प्रतिबंध के बाद भी संगठन ने राजनीतिक प्रभाव बनाए रखा।
  8. 1941 के नगरपालिका चुनाव ने संगठन की जनस्वीकृति को प्रदर्शित किया।
  9. 1942 में चण्डावल की घटना ने जागीरदारों और लोक परिषद के टकराव को उजागर किया।
  10. 1947 का डाबड़ा काण्ड मारवाड़ के किसान-राजनीतिक संघर्ष की अंतिम प्रमुख घटनाओं में शामिल है।

Exam Trap: मारवाड़ लोक परिषद से जुड़े भ्रम

भ्रम 1: मारवाड़ प्रजामंडल और मारवाड़ लोक परिषद एक ही संगठन थे।

सही तथ्य: मारवाड़ प्रजामंडल 1934 में और मारवाड़ लोक परिषद 16 मई 1938 में स्थापित हुई।

भ्रम 2: लोक परिषद की स्थापना जय नारायण व्यास ने स्वयं की थी।

सही तथ्य: स्थापना के समय व्यास राज्य से बाहर थे। प्रारंभिक नेतृत्व में रणछोड़दास गट्टानी और अभयमल जैन जैसे नेता प्रमुख थे। बाद में जय नारायण व्यास परिषद के प्रमुख नेता और अध्यक्ष बने।

भ्रम 3: लोक परिषद केवल किसानों का संगठन था।

सही तथ्य: इसका मुख्य राजनीतिक उद्देश्य उत्तरदायी शासन और नागरिक अधिकार था। बाद में किसान प्रश्न इसके आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

भ्रम 4: चण्डावल और डाबड़ा एक ही घटना हैं।

सही तथ्य: चण्डावल की घटना 28 मार्च 1942 से और डाबड़ा काण्ड 13 मार्च 1947 से संबंधित है।

भ्रम 5: डाबड़ा काण्ड में निश्चित रूप से एक ही पक्ष पर सरकारी गोली चली थी।

सही तथ्य: जिला गजेटियर आधारित विवरण इसे जागीरदारों के समर्थकों और किसानों के बीच संघर्ष के रूप में दर्ज करता है तथा दोनों पक्षों में जान-माल की क्षति का उल्लेख करता है।

मारवाड़ लोक परिषद आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व

मारवाड़ लोक परिषद ने जोधपुर रियासत में राजनीतिक आंदोलन को एक संगठित दिशा दी। इससे पहले अलग-अलग संस्थाओं और नेताओं के माध्यम से नागरिक अधिकार और प्रशासनिक सुधार की मांग उठती रही थी। लोक परिषद ने इन मांगों को उत्तरदायी शासन के व्यापक राजनीतिक लक्ष्य से जोड़ा।

इस आंदोलन का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह था कि राजनीतिक संघर्ष धीरे-धीरे ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचा। किसानों की समस्याएं, जागीरदारी व्यवस्था और अवैध वसूली जैसे विषय राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बने। इससे आंदोलन का सामाजिक आधार बढ़ा।

तीसरा पहलू राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से इसका संबंध था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मारवाड़ की राजनीतिक गतिविधियां राष्ट्रीय संघर्ष से जुड़ीं। इससे रियासत के भीतर उत्तरदायी शासन की मांग और भारतीय स्वतंत्रता की मांग के बीच संबंध मजबूत हुआ।

1947 तक आते-आते यह स्पष्ट हो गया था कि पुरानी निरंकुश रियासती व्यवस्था लंबे समय तक कायम नहीं रह सकती। डाबड़ा जैसी घटनाएं उस संक्रमणकालीन स्थिति को दर्शाती हैं जिसमें किसान, राजनीतिक कार्यकर्ता और जागीरदार अपने-अपने अधिकारों तथा भविष्य को लेकर संघर्ष कर रहे थे।

मारवाड़ लोक परिषद और राजस्थान का प्रजामंडल आंदोलन

राजस्थान के अलग-अलग देशी राज्यों में प्रजामंडल आंदोलनों ने राजनीतिक जागृति पैदा की। मेवाड़, जयपुर, बीकानेर, मारवाड़, कोटा, भरतपुर और अन्य रियासतों में जनता ने नागरिक अधिकार और उत्तरदायी शासन की मांग की।

मारवाड़ लोक परिषद इसी व्यापक आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। इसका विशेष महत्व इसलिए था क्योंकि जोधपुर रियासत में राजनीतिक आंदोलन के साथ किसान और जागीरदारी प्रश्न भी गहराई से जुड़ गया था।

राजस्थान के अन्य प्रजामंडल आंदोलनों के साथ तुलना करते समय यह याद रखना चाहिए कि प्रत्येक रियासत की प्रशासनिक और सामाजिक परिस्थितियां अलग थीं। इसलिए सभी आंदोलनों को एक जैसा मानना उचित नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना कब हुई?

मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना 16 मई 1938 को हुई।

मारवाड़ लोक परिषद का मुख्य उद्देश्य क्या था?

इसका मुख्य उद्देश्य मारवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापना और जनता के नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना था।

मारवाड़ लोक परिषद के प्रमुख नेता कौन थे?

रणछोड़दास गट्टानी, अभयमल जैन, जय नारायण व्यास और मथुरादास माथुर इसके प्रमुख नेताओं में शामिल थे।

मारवाड़ प्रजामंडल की स्थापना कब हुई?

मारवाड़ प्रजामंडल का गठन 1934 में हुआ था।

मारवाड़ लोक परिषद को गैरकानूनी कब घोषित किया गया?

29 मार्च 1940 को मारवाड़ लोक परिषद और उसकी शाखाओं को गैरकानूनी घोषित किया गया।

मारवाड़ लोक परिषद के प्रथम डिक्टेटर कौन थे?

1940 में प्रतिबंध के बाद मथुरादास माथुर को परिषद का प्रथम “डिक्टेटर” बनाया गया था।

चण्डावल प्रकरण कब हुआ?

चण्डावल प्रकरण 28 मार्च 1942 को उत्तरदायी शासन दिवस के कार्यक्रम के दौरान हुआ।

बालमुकुंद बिस्सा का निधन कब हुआ?

बालमुकुंद बिस्सा का निधन 19 जून 1942 को हुआ।

डाबड़ा काण्ड कब हुआ?

डाबड़ा काण्ड 13 मार्च 1947 को डीडवाना क्षेत्र में हुआ। यह लोक परिषद और किसान सभा से जुड़े किसानों तथा जागीरदार पक्ष के बीच संघर्ष से संबंधित था।

मारवाड़ लोक परिषद का राजस्थान के इतिहास में क्या महत्व है?

इसने जोधपुर रियासत में उत्तरदायी शासन, नागरिक स्वतंत्रता और किसान अधिकारों की मांग को संगठित राजनीतिक आंदोलन का रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

निष्कर्ष

मारवाड़ लोक परिषद एवं प्रजामंडल आंदोलन को समझने के लिए 1934 के मारवाड़ प्रजामंडल से लेकर 1938 की लोक परिषद, 1940 के सरकारी प्रतिबंध, 1941 के नगरपालिका चुनाव, 1942 के चण्डावल संघर्ष और 1947 के डाबड़ा काण्ड तक की पूरी श्रृंखला को देखना आवश्यक है।

इस आंदोलन ने मारवाड़ की जनता के सामने एक स्पष्ट राजनीतिक प्रश्न रखा कि शासन में जनता की भागीदारी क्यों नहीं होनी चाहिए। इसी के साथ किसानों की आर्थिक समस्याओं और जागीरदारी व्यवस्था के विरुद्ध आवाज भी मजबूत हुई। जय नारायण व्यास और अन्य नेताओं के नेतृत्व में यह संघर्ष अंततः जोधपुर रियासत में उत्तरदायी शासन और लोकतांत्रिक राजनीति की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बना।

राजस्थान इतिहास की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को इस विषय में खास तौर पर 1934, 16 मई 1938, 29 मार्च 1940, 1941, 28 मार्च 1942, 19 जून 1942 और 13 मार्च 1947 की तिथियों को क्रमवार याद रखना चाहिए। इससे मारवाड़ के प्रजामंडल आंदोलन, किसान आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलन के बीच संबंध समझना आसान होगा।

अधिक राजस्थान इतिहास नोट्स: राजस्थान इतिहास | राजस्थान के किसान आंदोलन

अंतिम संशोधन (Last Updated): 14 सितंबर 2026
✓ 100% सिलेबस सत्यापित (2026 पैटर्न)
Sudhir Sirइतिहास विशेषज्ञलेखक परिचय
तैयारी का स्व-मूल्यांकनफ्री डेमो उपलब्ध
राजस्थान CET 12वीं स्तर 2026 – Final Mega Test Series
99

नोट्स पढ़ लिए? अब अपनी तैयारी की वास्तविक रैंक देखें!

राजस्थान CET 12वीं स्तर 2026 – Final Mega Test Series

  • 100% नवीनतम 2026 परीक्षा पैटर्न व OMR 5th Option आधारित
  • All-Rajasthan रैंक और विस्तृत व्याख्या सहित उत्तर
  • वेबसाइट एवं एंड्रॉइड ऐप दोनों पर तुरंत एक्सेस
⚡ PhonePe · Google Pay · Paytm UPI द्वारा तुरंत सुरक्षित सक्रियण

🎯 विगत वर्षों के प्रश्न (Interactive PYQs)

Q1. मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना किस वर्ष हुई थी?

Rajasthan History Practice 2026

Q2. मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना की सही तिथि कौन-सी है?

Rajasthan GK Practice 2026

Q3. मारवाड़ लोक परिषद का प्रमुख उद्देश्य क्या था?

RPSC/RAS Practice 2026

Q4. 1940 में मारवाड़ लोक परिषद का प्रथम 'डिक्टेटर' किसे बनाया गया था?

Rajasthan History Practice 2026

Q5. मारवाड़ लोक परिषद को गैरकानूनी कब घोषित किया गया था?

Rajasthan GK Practice 2026

Q6. 1941 में जोधपुर नगरपालिका के अध्यक्ष कौन बने?

RPSC/RAS Practice 2026

Q7. चण्डावल प्रकरण किस तिथि से संबंधित है?

Rajasthan History Practice 2026

Q8. बालमुकुंद बिस्सा का निधन किस वर्ष हुआ था?

Rajasthan GK Practice 2026

Q9. डाबड़ा काण्ड किस तिथि को हुआ था?

RPSC/RAS Practice 2026

Q10. मारवाड़ प्रजामंडल की स्थापना किस वर्ष हुई थी?

Rajasthan History Practice 2026

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना 16 मई 1938 को हुई थी।

मारवाड़ में उत्तरदायी शासन की स्थापना तथा जनता के नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना इसका मुख्य उद्देश्य था।

रणछोड़दास गट्टानी और अभयमल जैन इसके प्रारंभिक नेतृत्व से जुड़े प्रमुख नेता थे।

जय नारायण व्यास मारवाड़ के प्रमुख राजनीतिक नेताओं में थे और बाद में मारवाड़ लोक परिषद के अध्यक्ष बने। उन्होंने उत्तरदायी शासन और नागरिक अधिकारों की मांग को मजबूत किया।

29 मार्च 1940 को मारवाड़ लोक परिषद और उसकी शाखाओं को गैरकानूनी घोषित किया गया।

1940 में संगठन पर प्रतिबंध के बाद मथुरादास माथुर को प्रथम डिक्टेटर बनाया गया था।

चण्डावल प्रकरण 28 मार्च 1942 को उत्तरदायी शासन दिवस के कार्यक्रम के दौरान हुआ था।

बालमुकुंद बिस्सा का निधन 19 जून 1942 को जोधपुर में हुआ था।

डाबड़ा काण्ड 13 मार्च 1947 को डीडवाना क्षेत्र में हुआ था और यह लोक परिषद तथा किसान सभा से जुड़े किसानों और जागीरदार पक्ष के बीच संघर्ष से संबंधित था।

मारवाड़ प्रजामंडल 1934 में गठित हुआ था, जबकि मारवाड़ लोक परिषद की स्थापना 16 मई 1938 को हुई। दोनों मारवाड़ में नागरिक अधिकार और उत्तरदायी शासन की व्यापक राजनीतिक चेतना से जुड़े अलग-अलग संगठन थे।

क्या आपको यह अध्ययन नोट्स पसंद आए? अपने दोस्तों के साथ अवश्य शेयर करें:

मुफ्त अध्ययन सामग्री और सिलेबस ट्रैकर के लिए विजिट करें: https://suyogacademy.com© 2026 Suyog Academy